एक बूँद स्याही
एक बूँद स्याही की जो मिल जाती तो कुछ लिख लेता
कागज को तो बयान अपनी दास्ताँ कर देता
सोचा की स्याही नहीं तोह अश्क़ तो बहुत हैं हमारे पास
लेकिन कम्बक्त ये जो अश्क़ है इसका रंग तो है पानी के जैसा
वो तोह अश्क़ मेरी निगाहो में ना देख पाये
कि जो लिख दूँ अश्क़ से तो वो कैसे देखेंगे
कागज को तो बयान अपनी दास्ताँ कर देता
सोचा की स्याही नहीं तोह अश्क़ तो बहुत हैं हमारे पास
लेकिन कम्बक्त ये जो अश्क़ है इसका रंग तो है पानी के जैसा
वो तोह अश्क़ मेरी निगाहो में ना देख पाये
कि जो लिख दूँ अश्क़ से तो वो कैसे देखेंगे
